कोरोना – जिहाद का लिटमस टेस्ट

विश्व में सब जगह इस नयी माहमारी का प्रकोप है। सैकड़ों की गिनती में लोग मर रहे हैं। भारत में देश बंदी का सिलसिला है – २१ दिनों तक। इस कोरोना वायरस से निपटने में कई बड़े और विकासशील देश अपने घुटनो पर आ गए हैं। भारत में फिर भी आशा की लहर है।

इन सब के बीच पिछले हफ्ते कुछ १५००-२००० की तादाद में मुसलमान दिल्ली की निजामुद्दीन दरगाह के समीप एक मरकज़ में पाए गए। यह कोई आयीसोलेटेड किस्सा नहीं है। देश भर में कई मस्जिदों की ऐसी खबरें आयी हैं जिनमे सरकार के निवेदन के बावजूद लोग सामूहित होते पाए गए। यह खबर इन शब्दों में नहीं आयी। न्यूज़ चैनल वाले तबलीघी को तालिबान कह कर चुटकी ले रहे हैं। कोरोना बम चर्चा में है। कोरोना जिहाद भी। वैसे तो कोरोना से संक्रमित व्यक्ति किसी बम के सामान ही है। अपने साथ कई हज़ारों की मृत्यु का कारण बन सकता है। ऐसे में मुसलमानों का भागना, छुपना कहाँ तक सही है? वामपंथियों का कहना है की ऐसी विषंड गैरज़िम्मेदाराना हरकत का दोष केवल मुसलमानों पर नहीं, वरन यह एक सामूहिक समस्या है। मरकज़ की घटना के तुरंत पहले तथा तुरंत बाद कई धर्म-सम्प्रदाय के लोग ऐसी हरकत करते पाए गए। न्यूज़ चैनल वालों ने इसे गैरज़िम्मेदाराना तो कहा, पर आतंकवाद नहीं।

 

EUcrEobUMAAnLmK

 

आतंकवाद एक विचित्र दोष है। २०१० में एक फिल्म आयी – माय नेम इस खां। अमेरिकी ट्रेड सेंटर पर आतंकवादी हमला होता है और तुरंत अमेरिकी हर मुसलमान से दरकिनार कर लेते हैं। मुसलमान होना आपको संदिग्ध श्रेणी में दाल देता है। उत्पीड़न और सताव का माहौल बन जाता है। २०१४-१५ से पूर्व मैंने यह फिल्म नहीं देखी थी – तकनीकी आधुनिकता से परे होने के कारण। पर टीवी में आये गीतों में देखती थी फिल्म का मुख्य किरदार रिज़वान सड़क के किनारे एक बोर्ड ले कर खड़ा है – “रिपेयर ऑलमोस्ट एनीथिंग” (अर्थ – लगभग किसी भी चीज़ की मरम्मत कर सकता हूँ।) क्या कमाल के शब्द हैं। मेरे मानसपटल पर ये शब्द वर्षों तक अंकित रहे। इन शब्दों में साहस तो है पर लाचारी भी है। जीवन के कुछ पहलुओं के प्रति समर्पण। जैसे क्या?

रूमी लिखते हैं “डिस्ट्रॉय योर रेपुटेशन। बी नोटोरियस।” अपनी प्रतिष्ठा को बर्बाद करो। कुख्यात हो जाओ। प्रतिष्ठा उन कुछ चीज़ों में से है जिनकी मरम्मत करना किस हद तक संभव है, मालूम नहीं। कुछ बातें इतनी बेतुकी होती हैं की उन्हें केवल कविता में लिखा जा सकता है। मुसलमान समुदाय की प्रतिष्ठा के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण समय है। कारण कई, जैसे सीएए का मुद्दा। अगर मुसलमान मूल रूप से आतंकवादी घोषित हो जाता है तो यह मुद्दा और भी ठोस हो जाता है। हाल ही में वरिष्ठ भाजपा नेता सुभ्रामणियम स्वामी के एक इंटरव्यू का कुछ अंश वायरल हुआ है। वह कहते हैं हमने वही किया जो देश चाहता है। यह मुद्दा नया नहीं है।

मुद्दा क्या है? मुद्दा यह है की काफी समय से – या यूँ कहें की सदियों से हिन्दू खतरे में है। क्या यह मुद्दा निराधार हैं? नहीं। क्या आज का हिन्दू वाक्कई खतरे में है? उल्लेखनीय तो नहीं परन्तु नाकाम अभिनेत्री पायल रोहतगी एक वीडियो में कहती हैं “हिन्दू जाग गया हैं।” उनका कहना हैं गांधीवाद के चलते ७० वर्षों से हिन्दू एक मीठी नींद सो रहा था। “अहिंसा परमो धर्मः” एक अधूरा श्लोक हैं जो गाँधी ने जानते-बूझते अधूरा छोड़ा। “धर्म हिंसा ताथीव च” इसे पूरा करता है। अतः गाँधी की हत्या ना केवल सराहनीय वरन धार्मिक भी है। मिलते जुलते विचारों पर भारतीय दक्षिणपंथियों की हामी है। जब अंडे को छूने से अशुद्ध हो जाने वाला हिन्दू ह्त्या को धार्मिक बताने लगे तो समझ जाना चाहिए की दरअसल अब हर कोई खतरे में है। इशारा साफ़ हैं – उसे अब अतीत के प्रतिफल की चेष्टा हैं।

ऐसी स्तिथि में किसी भी मुद्दे पर टिप्पड़ी करने में मैं एहतियात करती हूँ। ऐसे कई मुसलामानों को मैं जानती हूँ जिनका ताकिया शान्तिप्रद है, आतंकवादी नहीं। गैर मुसलमान होने के नाते मेरे भी कई प्रश्न हैं इस्लामिस्ट लोगों से। दरअसल नब्बे की भीड़ अगर ढांचा गिराने पर उतारू हो तो उसमे बचे हुए दस को भी दबना पड़ता हैं। ख़ास तौर पर अगर दस हज़ार में वो सौ ही हों। लोकतंत्र का अल्पसंख्यक पर यही अभिशाप हैं की अब वह केवल अब्दुल कलाम हो सकता है।

One Reply to “कोरोना – जिहाद का लिटमस टेस्ट”

  1. पहले देश के विभाजन के हक में वोट देना और फिर भारत को इस्लामिक मुल्क बनाने के लिए रुक जाना, अश्मिता जी कृपया इसे भी डेढ़ बीघा का पोस्ट लिख के defend करें।
    मुसलमान corona फैलने के लिए दोषी पाए गए, उनके मंसूबों के बारे में दबे शब्दों में सच दिखाया जा रहा है। हालांकि की आप एजेंडा के कारण तब तक सोते रहना चाहती हैं जब तक उन्मादी भीड़ Allahu Akbar बोलते हुए इज्जत को तार तार ना करदे, लेकिन मानव का प्राकृतिक व्यवहार ऐसे नहीं काम करता अश्मिता जी। मानव प्रजाति अपनी गलतियों से सीखती है, उन गलतियों में शामिल सबसे पहले और सबसे आखिर में है दयावान होना, देश के विभाजन करवाने में अहम भूमिका मुस्लिम की बावजूद इसके नेहरू ने दया की। यही दया परेशानी का कारण बन रही है।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.