विपत्ति के समय में धर्मांध तथा छीछालेदर

अमेरिकी प्रेजिडेंट ट्रम्प बार बार कहते हैं कोरोना वायरस चीन से आया है – यह चीनी वायरस है। कुछ लोगों का ये भी कहना है की चीन को यह समस्या फैलाने के लिए दंड देना चाहिए। परन्तु कोरोना वायरस का मूल कुछ ऐसा है जो डोनाल्ड ट्रम्प साहिब नहीं जानते। अगर जानते होते तो बेमतलब चीन तो बदनाम न करते। चीन बेक़सूर है।कोरोना वायरस दरससल कुरआन से आया है। कुरआन कोरोना – समझ ही रहे होंगे आप। कुछ लोगों का कहना है की कोरोना शब्द “क्राउन” का लैटिन अनुवाद है और ये नाम उसके आकार के वजह से दिया गया है। यह भी झूठ है। मूल शब्द कुरआन है। ये मै नहीं कह रही हूँ – ऐसे वीडियो आ रहे हैं। दिल्ली के शाहीन बाग़ में प्रोटेस्ट करती महिलाएं ये इलाका खाली करने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कोरोना वायरस अल्लाह की ओर से है और उनपर इसका कोई असर न होगा।

सुनिए एक और रोचक बात।आप तो जानते ही हैं चिकन पॉक्स कोई बिमारी नहीं स्वयं देवी हैं? नहीं जानते तो जान लें। चिकन पॉक्स आये तो उसको देवी पूजा कर के शांत करना पड़ता हैं। ये देवी ऐसे बाग़ वगैरह में टहलते कभी भी आ सकती हैं। अगरबत्ती लेकर तैयार रहिये। अब क्यूंकि चिकन पॉक्स पुराना हो गया है, देवी ने मार्किट में कुछ नया लांच किया है। हिन्दू महासभा वाले खपा रहे हैं पन्चानबे किलो धूपबत्ती कपूर इत्यादि देवी वर्ज़न २.१ शांत कराने में। कई आयोजन भी हुए गौमूत्र टी पार्टी के। बहुत वीडियो आये मू सड़ा सड़ा के गौमूत्र पीने वालों के। क्या आप जानते हैं स्वास्थय को ले कर कुछ लोग इतने अधिक सचेत हो जाते हैं की अपना खुद का मूत्र पीने लगते हैं? वह भी कोई ऐसा वैसा मूत्र नहीं, सुबह का पहला। जब जूस वाला गन्ने को गारता है तब एक दो बार में नहीं मानता। मगर साहब आप तो गन्ने नहीं हैं न? शरीर जिसे निचोड़ के मूत्र निकाल चुका है उसे क्यों औषधि बना कर चुस्की लिए जा रहे हैं?

इसी क्रम में कई ईसाई लोगों के लिए ये दुनिया के अंत आ चुका है। क्वारेंटीन के नाम पे अपने बालकनी छज्जे से ये लोग दुनिया का सन्नाटा देख मन मन में गदगद हो रहे हैं की अब ईश्वर का प्रकोप आ रहा है। सब तबाह हो जायेगा और मसीह आएँगे और इनको उड़ा के अपने साथ स्वर्ग ले जाएंगे। इन्ही ईसाईयों को एक भाईसाहब प्यार से ईसाई कसाई कहते हैं। जहाँ तक मेरा अनुमान है, इनकी सोच देख स्वर्गलोक में बैठे मसीह स्वयं घिन्ना के अपना टिकट कैंसिल करवा रहे हैं – “ये किसके लिए जान दे दी मैंने – अनडू अनडू!”

विदेश में इसे “कॉलिंग डिब्ब्स” कहते हैं। मान लीजिये दो लड़के एक डिस्को-बार में गए। वहां एक खूबसूरत लड़की टहल रही है। जिस लड़के ने उसको देख कर पहले “तेरी भाभी” कह दिया उस लड़की पे वही चांस मार सकता है। यह “कॉलिंग डिब्ब्स” और चीज़ों पर भी लागू कर सकते हैं। कुछ भी – कुर्सी, कमरा, आलमारी। धर्मों ने कोरोना वायरस पर “कॉलिंग डिब्ब्स” कर लिया है – ये बिमारी हमारी। हाँ तो ले लो ?

विचित्र स्थिति बनी हुई है। दुनिया एक बिग बॉस का घर बन चुका है जहाँ हफ्ते दर हफ्ते हर किसी की समझदारी का पोल चिटठा खुल रहा है। अभी एक आधे दिन पहले प्रधानमन्त्री मोदी जी ने समय फिक्स किया पांच बजे आना और बालकनी से ताली बजाना कुल पांच मिनट। क्यों? जो डॉक्टर, नर्स, पुलिस, रेलवे वाले आपके हित में देश का ठेका ले रहे हैं, उनकी सराहना करने के लिए। अच्छी बात है। मान लेनी चाहिए। निकले घर से – बजायी ताली थाली और शंख। कालोनी के और भी लोग बाहर आये थे। एक विचित्र सकारात्मकता का अनुभव हुआ। फिर वापिस टीवी के पास गए। भारत को दुनिया के कई हिस्सों में एग्जॉटिक लोकेशन कहा जाता है। अद्भुत भारत – भारत के रंग। जो खबर टेलीकास्ट हुई वह सचमुच अद्वितीय थी। मालुम चला पांच मिनट के टी ब्रेक में लोगों ने अड़तालीस मिनट की जन्माष्टमी मना ली कहीं कहीं तो। क्यूंकि बहुत ज़ोर का शंखनाद करने से ये कोरोना वायरस जो है बिलबिला के सब जगह मर गया है। नार्थ कोरिया में एक बीमार व्यक्ति को संक्रमण रोकने के लिए गोली मार दी। भारत में ऐसा नहीं कर सकते क्यूंकि यहाँ डेमोक्रेसी है। कभी कभी ऐसा नहीं लगता की इतनी भी मज़ेदार नहीं है ये डेमोक्रेसी?

मनुष्य जात से ही आत्मिक आध्यात्मिक है। वह किसी भी रूप में कुछ न कुछ अलौकिक ढूंढ ही लेता है। आम तौर पे ये सब इतना बचकाना नहीं लगता। पर आप सोच के देखिये की बेकाबू हुई ये आध्यात्मिकता आपत्तिकाल में कितनी ज़हर हो सकती है – कत्तई जानलेवा। ये सब पढ़ के चिढ़चिढ़ायें नहीं। खूब ज़ोर से हसें। क्यूंकि जितना जीवन शेष है उसमे जो मज़ा आ सकता है आ जाना चाहिए। इटली वालों को देखिये। जहाज डूब रहा है – बालकनी में बैठ के वे टाइटैनिक की धुन बजा रहे हैं। टाइटैनिक में आपत्तिकाल में संगीत बजाते लोगों को देख के हमेशा ऐसा सोचती थी की ये बहुत रोचक है या बहुत फ़िल्मी? इस संगीत में मिला जुला भाव है। है तो। लाशें उठाने आर्मी आयी है। कुछ ज़्यादा ही लोग मर गए। इसे तीसरा चरण कह रहे हैं जो भारत में अभी आया नहीं है ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है। या लोग सकपकाएँ नहीं इसलिए बता नहीं रहे हैं सही आंकड़े। पता नहीं क्या है।

हमारे घर में अलग व्यवस्था है। समझदारी दिखाते हुए हमने घर से निकलना बंद कर दिया है। खाना पीना तो ठीक है पर किचन में तीन मैगी के पैकेट पड़े हैं जिनको देखते ही मेरे मन में दो शब्द आते हैं – “आखिरी इच्छा”। इन तीन पैकेट पर मेरा “कॉलिंग डिब्स” है। अगर मौत आने वाली हो तो मेरे “रेस्ट इन पीस” के लिए मैगी बहुत ज़रूरी है। इतनी आत्मिकता मुझमे भी है की मै कहूं की दुनिया इधर से उधर हुई तो भी मै मरूंगी नहीं। मैगी स्थिति सँभालने के बाद खाउंगी। जब भी किचन में जाती हूँ, मैगी देख के इस सोच का विश्लेषण करती हूँ – ठीक-ठाक-बचकाना से लेकर कतई-बचकाना के मापदंड पर ये जिजीविषा से भरी आत्मीयता का ख़याल कितना बचकाना है।

मौजों की रवानी है …ज़िन्दगी और कुछ भी नहीं …

 

चित्र का श्रेय: माननीय माइकलएंजेलो का “द क्रीएशन ऑफ़ आदम” वाला गूगल किया हुआ वॉलपेपर

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