मेरा दो दुनी पांच

नाना को देखा नहीं है मैंने। मां उनके किस्से सुनाती रही है इसलिए कल्पना ने उनका ढांचा तैयार कर रखा है। नाना ऐसे थे। शायद नाना उसके परे बहुत कुछ हों। कुछ ऐसे जो मां भी ना जानती हो? मां बाप भी तो इंसान होते हैं। बचपन में ऐसा नहीं लगता था। बचपन में लगता था ठीक उल्टा। क्यूंकि ईश्वर से साक्षात्कार नहीं था। जो स्त्रोत होता है, वही ईश्वर होता है। इसी लिए हमारे यहां सूर्य नदी हर चीज़ की पूजा कर लेते हैं।

बचपन में बहुत बार गांव शहर की सड़कों पर मैं खोई हूं। बचपन का मन सरल होता है। उसे लगता है सब बड़े लोग एक दूसरे को जानते हैं। अंजान लोगों को बार बार बताती – सुसक सुसक के – विनोद राय। अजीब लोग हैं। पापा को नहीं जानते। एक कच्चे मकान वाली आंटी मुझे गोद में बिठा लेती हैं। शायद अब मैं हमेशा के लिए खो चुकी हूं। ये आंटी लगता है अब मुझे पालेंगी। पर ये मुझे पाल भी लें तो मेरी मां तो नहीं बन जाएंगी। मां की सगी बहन को भी मां न कह कर मां-सी कहते हैं। स्त्रोत बदलने से मायने नहीं बदल जाते। मां मां होती है। आंटी आंटी। इतना सब ना भी समझे तो भी बच्चे का मन इतना समझता है की मां के पास जाना है। अभी शांत हुई मैं वापस बिलखने लगती हूं।

सपने आते थे। मैं गिर रही हूं एक ऊंची ईमारत से। जान चली ही जाएगी लगता है। कहीं से छलांग मारते हुए पापा आते हैं और मुझे बचा लेते हैं। ये हमारा रोज़ रोज़ का था। ऐसे सपने पापा को भी आते थे। कभी कभी गहरी नींद से वह “बच्ची१११११!” चीखते उठ जाते थे। मैं ठुबक ठुबक कर पापा के पेट पर चढ़ती और सीने पर सर रख के सो जाती। हम दोनों फिर चैन से सोते। ये हमारी दुनिया।

आठवीं में एक अध्यापक मुझसे पूछते हैं – “अपने पिता का नाम बताओ!” “विनोद राय!”
“क्या वे तुम्हारे मित्र हैं?”
कुछ सोच कर मैं कहती हूं – “हैं तो!”
साहब कुछ क्षण मुझे ताकते हैं।
“बड़े लोग का नाम ऐसे नहीं लेते। श्रीमान लगा कर बोलो!”
“जी महोदय! श्रीमान विनोद राय!”

बचपन सरल होता है। पर जीवन सरल नहीं होता। अधिकांश का। आपका जीवन गर सरलता से गुजरा हो तो भी उस सरलता को दूसरों पर मढ़ते नहीं चलना चाहिए। खास तौर पर एक पुरुष को स्त्री पर। स्त्री होने का एक विशेष भाग है सुरक्षा की भावना की आवश्यकता। यह भावना अगर उसे अपने पिता से मिले तो जीवन काफी हद तक सरल हो जाता है। जैसे पिता में एक मित्र भी मिल जाना। वरन आपने सुना होगा – डैडी इशूज़। डैडी इशूज़ वाली लड़कियों की एक अलग ज़ात होती है। ये वही हैं जिन्होंने सैक्शुअल रिवोल्यूशन फैमिनिज़म इत्यादि लाया। मेरे आफिस में एक मैडम आपने तीन माह के शिशु को कहीं क्रैच में छोड़ कर आती थीं। क्रैच में एक कैमरा था जो सीधा उनके फ़ोन पर टैलिकास्ट करता। बच्चा बिलखता। यहां बैठ वो भी छटपटातीं। बच्चा किसी आंटी के पास है। बच्चा सुरक्षित है। यह हम जानते हैं। बच्चा नहीं जानता। “ये आंटी लगता है अब मुझे पालेंगी।” यह फैमिनिज़म का मूल्य है – जो समाज चुका रहा है।

आप समझेंगे मैं महिलाओं की प्रोग्रेस के खिलाफ हूं। जी नहीं। पर प्रोग्रैस का मूल्यांकन करना भी जरूरी है। आप विवाह का उदाहरण लीजिए। विवाह परमेश्वर का प्रस्ताव है। अपने बन्दे से कहता है – “दुनिया की हर स्त्री को तज इस एक के हो जाओ।” पर दुनिया विशाल है। स्त्रियां भी हर रंग रूप बनावट की हैं। यह कैसा प्रस्ताव है। पंडित दूल्हे को धमकाता है – “कयामत के दिन तू परमेश्वर के समक्ष इस रिश्ते का जवाबदेह होगा।” दूल्हा भाग जाना चाहता होगा। पकड़ने के लिए साढ़े आठ सौ लोग बुला रखे हैं। मुंह सूखने को आता है। दूल्हा छिपकली सी आवाज़ में कहता है “जी!” यह परमेश्वर का भय है। और यह एक अच्छी चीज़ है। घर की चौखट के बाहर जहां बीवी का भय खत्म हो जाता है वहां से परमेश्वर का भय आरंभ होता है। उस ही भय के भरोसे स्त्री अपने पिता की सुरक्षा से बाहर किसी दूसरे के घर सरलता से चली जाती है। सैक्शुअल रिवोल्यूशन कहता है आपको आज्ञाकारिता की कोई आवश्यकता नहीं। कोई भय न माने। क्या यह प्रोग्रेस है?

पिता का पिता होना, पति का पति होना, माता का माता होना परमेश्वर की बुलाहट है। कोई ज़बरदस्ती नहीं है। आप इससे पीछे हट सकते हैं। बहुत नेता वैज्ञानिक हुए जो न पति हुए ना पिता। वह भी महान हैं। नेता की नेतागिरी भी परमेश्वर की बुलाहट है। भले ही आज की राजनीति देख कर यह न लगता हो। एक पूरे देश की कमान हाथ में रख कर भी मनुष्य परमेश्वर का भय न माने, यह संभव है। फिर विवाह क्या चीज़ है।

तो एक रोज़ संपूर्ण मानवजाति के विवेक पर पर्दा पड़ जाता है। परमेश्वर ने मनुष्य बनाया। परमेश्वर ने सूर्य को भी बनाया। सूर्य में ऊर्जा है। मनुष्य में भी ऊर्जा है। सूर्य प्रकाश देता है। फसल उगती है। पुरुष नौकरी को जाता है। घर अन्न लाता है। “यह मेरी मेहनत” कहकर खा लेता है। परमेश्वर का धन्यवाद नहीं करता। असल स्त्रोत से संबंध खत्म। संबंध खत्म तो भय भी खत्म। कल फिर वह काम पर जाता है। अब मनुष्य खुद का ईश्वर है। उसकी जवाबदेही खुद से है। अगर वह ईमान बेच भी खाए तो भी कोई सवाल नही कर सकता। इससे भयावह और क्या है।

इसके आगे एक अलग प्रकार की आज़ादी की शुरुआत होती है। कहने वाले कहते हैं यह आवश्यक नहीं एक मर्यादित जीवन जीने के लिए परमेश्वर की आवश्यकता हो। बच्चे को मां की आवश्यकता क्या है। वह क्रैच में भी पल जाएगा। पत्नि को पति की आवश्यकता नहीं। वह कर्राटे सीख ले। आप समझ ही रहे होंगे कि रिश्तों की बुलाहट के विपरीत एक सामंजस्य सामाजिक स्तर पर बैठ चुका है।

यह कर्राटे क्यूं सीखा जाता है? सबको खबर है कि उल्टी हवा बह रही है। सब ईश्वर बन चुके हैं – मां बाप बच्चे। किसी की जवाबदेही नहीं है। आपका “बहुत ग़लत” किसी का “बहुत सही” भी हो सकता है। यह तो आप जानते ही हैं। अपनी समझ से सामंजस्य बैठ गया हो तो ईश्वर की कोई आवश्यकता नहीं है। जैसे मां बाप की आवश्यकता खत्म हो सकती है। क्यूंकि रचना तो हो चुकी है। इस होड़ में कई एक मायने खो भी जाए तो कोई शायद जान नहीं पाएगा। पुरनिया कहते थे दीवार जब गिर जाती है, तब उसकी आवश्यकता का आभास होता है।

चित्र का श्रेय: शालोम कृस्टोफर

8 Replies to “मेरा दो दुनी पांच”

    1. यहाँ भय का आशय डर या खौफ से नहीं अपितु आदर से है। पत्नी का भय होना बेलन का भय होना नहीं परन्तु इस बात का भय है की जिससे आप प्रेम करते हैं उससे रिश्ते में कोई त्रुटि न हो । उसी प्रकार परमेश्वर का भय ।

  1. एक मर्यादित जीवन जीने के लिए परमेश्वर की आवश्यकता हो ऐसा जरूरी नहीं है क्यूंकि परमेशवर ने हमें सभी प्रतिभाओं से संपन्न बनाया है और इसके साथ ही हमें स्वतंत्रता से जीवन जीने के गुण प्रदान किया है | अब यह हम, मनुष्यों पर निर्भर करता है कि हम किस प्रकार उन गुणों का सफल मर्यादित जीवन जीने मै प्रयोग करपाते है, उनको खोज पाते हैं |

    1. परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरुप में बनाया। ज़ाहिर है स्वयं परमेश्वर में जो प्रतिभाएं हैं उन सभी का लेश मनुष्य में है। परन्तु केवल प्रतिभा का होना नाकाफी है। प्रतिभा का सफल उपयोग करने के लिए विवेक (wisdom) की आवश्यकता होती है जिसका स्त्रोत स्वयं परमेश्वर है । सृष्टि से हमें ज्ञान (knowledge) प्राप्त हो सकता है परन्तु विवेक नहीं।
      तुलसी लिखते हैं “बिनु सत्संग विवेक न होइ”। यह सत्संग ढोल मृदंग से बहुत आगे बढ़ कर है, आशा है ये आप समझते ही होंगे ।

      1. इसका मतलब जो परमेश्वर को नाही मानता उसके अंतःकरण मै विवेक की स्थापना संभव नहीं?

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